नई दिल्ली: 2013 में, सुप्रीम कोर्ट ने मतदाताओं को 'उपरोक्त में कोई नहीं' (NOTA) विकल्प दिया, यह मानते हुए कि यह उन्हें अपनी नापसंदगी व्यक्त करने की शक्ति देगा।
लेकिन क्या यह पर्याप्त है?
नोटा की सीमाएं:
- राइट टू रिजेक्ट का अभाव: जब तक नोटा को 'राइट टू रिजेक्ट' का अधिकार नहीं दिया जाता, तब तक इसका प्रभाव सीमित रहेगा।
- अप्रासंगिकता: भले ही नोटा को सबसे अधिक वोट मिले, यदि किसी उम्मीदवार को एक भी वोट मिलता है, तो वह जीत जाएगा।
- राजनीतिक दलों पर प्रभाव की कमी: नोटा का प्रभाव बढ़ने के बावजूद, राजनीतिक दल स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवारों को खड़ा करने के लिए बाध्य नहीं हैं।
आंकड़े क्या कहते हैं?
- 2019 के लोकसभा चुनाव में, देशभर की 10 सीटों पर नोटा को सबसे अधिक वोट मिले, जिनमें से 5 बिहार से थे।
- यह दर्शाता है कि यदि राजनीतिक दल उम्मीदवारों के चयन में सावधानी नहीं बरतते हैं, तो नोटा की हैसियत बढ़ सकती है।
क्या नोटा को प्रासंगिक बनाने के लिए बदलाव की आवश्यकता है?
- नोटा को 'राइट टू रिजेक्ट' का अधिकार देना।
- नोटा वोटों को चुनाव परिणामों को प्रभावित करने के लिए एक निश्चित प्रतिशत निर्धारित करना।
नोटा:
- मतदाताओं की नाराजगी का प्रतीक
- राजनीतिक दलों के लिए चेतावनी
- चुनावी सुधारों की आवश्यकता का संकेत
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