पेट्रोल-डीजल की हदें पार करती कीमतों के खिलाफ जब देश में आम लोगों का आक्रोश बढ़ा तो केंद्र की चतुर सुजान सरकार ने एक बार फिर सियासी दांव से बाज न आने की हेकड़ी दिखाई है। पहले तो रोजाना के हिसाब से रेट बढ़ाते रहे, आंकड़ा साै तक बढ़ने के बाद सवा साै की तरफ जाने लगे तब तक नाराजगी का आलम बढ़ता गया।
इसी बीच कुछ राज्यों के उपचुनाव के नतीजे और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के गृह राज्य हिमाचल प्रदेश में भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया। वहां की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री को कहना पड़ा कि पेट्रोल डीजल के दाम और महंगाई बढ़ने की वजह से यह हार हुई। हिमाचल की इस खबर के बाद ही दीपावली के बीच ये समाचार आय़ा कि केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर पांच और डीजल पर दस रुपए कम किए है। एक्साईज ड्यूटी घटाई गई है।
पहली नजर में ये समाचार ठीक लगता है, लेकिन अगले ही क्रम में जाने में इसके पीछे छिपे सियासी दांव भी सामने आने लगते हैं। बड़ा सवाल ये कि ईंधन की कीमतों को क्यों बेतहाशा बढ़ाया गया। एक रिपोर्ट के मुताबिक सरकार को कीमत बढ़ाने से 1 लाख 75 हजार करोड़ रुपए का लाभ हुआ है। कीमतें बढ़ने की वजह टैक्स बढ़ना था, कीमत कम होने के पीछे भी वजह भी इतनी की टैक्स कम कर दिया। लेकिन इस पूरी कवायद के बीच देश की आम जनता,गरीब से लेकर मध्यमवर्ग तक लुट गया। डीजल के दाम बढ़ने से हर चीज का परिवहन भाड़ा बढ़ा औऱ कीमत बढ़ गई। लोगों को अपनी जेब झाड़कर कीमत चुकानी पड़ी।
अब सरकार कीमत घटा रही है तो भी कैसे उम्मीद की जा सकती है कि जिन चीजों के दाम ब़ढ़े है वे उसी अनुपात में कम हो पाएंगे। देश की जनता को इसकी कीमत चुकानी होगी। लेकिन बात बस इतनी सी नहीं है। केंद्र सरकार ने इसके साथ ही यह दांव भी खेला है कि अब राज्य पेट्रोल पर लगने वाला वैट कम करे। केंद्र के निशान पर ज्यादातर गैर भाजपा शासित राज्य हैं। राज्य अगर वैट कम करते हैं तो उन्हें सीधे मिलने वाले राजस्व में भारी कमी आएगी जो कम कर पाना उनके लिए बेहद कठिन होगा।
अगर गैर भाजपा राज्य रेट कम नहीं करते हैं तो उनकी किरकिरी करने की ही सियासत चल पड़ेगी। जिन गैर भाजपा राज्यों में जहां उनकी अर्थव्यवस्था बेहतर है वे कुछ कमी कर सकते हैं। पर जिन राज्यों की माली हालत माकूल नहीं है उनके लिए कठिनाई होगी। यही वजह हो सकती है कि कांग्रेस शासित पंजाब ने वैट में कटौती स्वीकार की है,लेकिन कांग्रेस शासित छत्तीसगढ़ इसके लिए तैयार नहीं हो पा रहा है। अन्य राज्यों की बात करें तो पश्चिम बंगाल भी इस मानने को तैयार नहीं है।
बात दरअसल ये है कि केंद्र ने पेट्रोल डीजल के मामले में जो दांव खेला है वो निहायत ही सियासी है। लगता है केंद्र सरकार को जनता के हितों से कोई लेना-देना नहीं रह गया है। उन्हें तो केवल चुनाव जीताने वाले हथियारों की जरूरत है, सत्ता में आकर किसी की भी परवाह न करने की आदत हो गई है। जनता समझ रही है यही है तेल का खेल।